Sunday, November 9, 2008

राहुल में रामुलु को देखिये

हिंदी पट्टी के राज्यों के पुनर्निर्माण की चुनौती
हरिवंश
मुंबई में मारे गये उत्तर भारतीय (जिनकी सूचनाएं सार्वजनिक हुई हैं)
1) 19 अक्तूबर - रामू दास - चलती ट्रेन से फेंका था, अब तक नहीं मिला - झारखंड के खूंटी का रहनेवाला - मजदूरी करता था।
2) 19 अक्तूबर - सकलदेव रजक - ट्रेन से फेंका, मौत - झारखंड के सिंदरी का - नौकरी की तलाश में था।
3) 19 अक्तूबर - पवन कुमार - पिटाई से हुई मौत - नालंदा का रहनेवाला - परीक्षा देने गया था।
4) 27 अक्तूबर - राहुल राज - एनकाउंटर में मरा - पटना का था - राज ठाकरे की तलाश में गया था।
5) 29 अक्तूबर - धर्मदेव राय - पिटाई से हुई मौत - उत्तर प्रदेश का था - मजदूरी करता था, छठ में घर लौट रहा था।गंभीर रूप से घायल
6) 30 अक्तूबर - दीनानाथ तिवारी, पत्रकार - भगवती अस्पताल में भरती - हिंदी पट्टी का - रिपोर्टिंग के दौरान गंभीर पिटाई।

अब तक मुंबई या महाराष्ट्र में पांच उत्तर भारतीयों के मारे जाने की पुख्ता सूचना है। राज ठाकरे के ऐसे आंदोलनों के आरंभिक चरणों में नासिक, नागपुर से लेकर अन्य जगहों पर भी उत्तर भारतीय मारे गये। अपमानित हुए। कई इलाकों से रातोंरात उन्हें भागना पड़ा। हजारों की संख्या में उनकी टैक्सियां या ऑटो तोड़े गये। पान की दुकानों पर हमले हुए। यहां इन घटनाओं के ब्योरा देने का मकसद, लंबी सूची देना नहीं है। हालांकि कोई युवा समूह या एनजीओ, महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में हिंदी पट्टी के लोगों के साथ हुए भेदभाव, अपमान, अत्याचार, हत्या, मारपीट और उजड़ जाने की घटनाओं को एकजुट कराता, तो आधुनिक भारत का महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार होता। दस्तावेज इन नेताओं के लिए नहीं, शासकों के लिए नहीं, बल्कि खुद हिंदीभाषी लोगों के लिए। अतीत के इस दस्तावेज से भविष्य के लिए सबक मिलेंगे।इन वारदातों में राहुल राज की घटना दूरगामी है। अब तक प्राप्त सूचनाओं के अनुसार राहुल, पटना के कदमकुआं का रहनेवाला था। 26 अक्तूबर को वह मुंबई गया था। काम की तलाश में। पर क्या हुआ कि राहुल राज, राज ठाकरे को ढूंढने निकल पड़ा? कोई अधिकारिक ब्योरा नहीं है। सूचना है कि राहुल शांत प्रवृत्ति का लड़का था। इंट्रोवर्ट। उसके मानस पर जब बिहारियों या हिंदीभाषियों के अपमान की बात आयी होगी, तो लगता है उसके अंदर युवा आक्रोश बौखलाने लगा होगा। फिर भी उसने कहीं कोई हिंसा नहीं की। न बस में यात्रा कर रहे सहयात्रियों के साथ या न किसी अन्य मुंबईवासी के साथ। वह हिंसक होता, तो उसने किसी पर गोली चलायी होती। कहीं कोई हिंसा की होती। वह बार-बार यात्रियों से कह रहा था, मैं आपको नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। मुंबई के जो लोग उसके साथ बस में थे, उनका विभिन्न चैनलों पर बयान था, पुलिस समझदारी से काम लेती, तो आसानी से वह पकड़ा जाता। उसे राज ठाकरे को ही मारना होता, तो वह बस हाइजैक क्यों करता? शायद उसके दिमाग में अपने गुस्से को इसी तरह सार्वजनिक बनाने की योजना रही हो। बिना किसी को कोई हानि पहुंचाये। पर महाराष्ट्र पुलिस ने उसकी हत्या की। इसके बाद वहां के गृहमंत्री आरआर पाटील का बयान आया, गोली का जवाब गोली से देंगे। लगता है, महाराष्ट्र में राज ठाकरे बनने की होड़ लग गयी है। उपमुख्यमंत्री आरआर पाटील हों या छगन भुजबल या नारायण राणे या मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख। सबके आचरण, काम और बयान देश का संकट बढ़ानेवाले हैं। हिंदीभाषी क्षेत्रों में भी जो हिंसक प्रतिक्रिया हुई, विरोध के कटु शब्दबाण चले, वे देशहित में कतई नहीं। आज भारत को एक रखना सबसे बड़ा एजेंडा है। शायद यह गलत है, क्योंकि देश तो किसी के एजेंडे पर है ही नहीं। बहरहाल आरआर पाटील से गृहमंत्री शिवराज पाटील या भारत सरकार को यह अवश्य पूछना चाहिए कि जब हिंदी पट्टी के युवा पीटे जा रहे थे, उनकी हत्याएं हो रही थीं, तब महाराष्ट्र प्रशासन और पुलिस कहां थे? दाउद इब्राहिम के गुंडे मुंबई में आतंक मचाते रहते हैं, तब आरआर पाटील की यह गोली कहां चली जाती है? मुंबई में उग्रवादी बेखौफ विस्फोट करते हैं, तब आरआर पाटील की यह बहादुरी कहां रहती है?

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